• तेरे कमाल की हद

    तेरे कमाल की हद कब कोई बशर समझा;
    उसी क़दर उसे हैरत है, जिस क़दर समझा;

    कभी न बन्दे-क़बा खोल कर किया आराम;
    ग़रीबख़ाने को तुमने न अपना घर समझा;

    पयामे-वस्ल का मज़मूँ बहुत है पेचीदा;
    कई तरह इसी मतलब को नामाबर समझा;

    न खुल सका तेरी बातों का एक से मतलब;
    मगर समझने को अपनी-सी हर बशर समझा।

    उस रात खुल के मुझसे भी रोया नहीं गया
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